मेरी कविताएं





तीन मनोदशा

गीताश्री

(1)
ट्रेन के दरवाजे पर खड़े-खड़े
तुम्हारे हिलते हाथ देखकर लगा
कि रोने की एक वजह यह भी हो सकती है..
जब तुमने खिड़की के परदे खींचे थे
मैं तब भी रोई
ये रोने की दूसरी वजह थी
मैं हतप्रभ हूं कि मैं अब भी रो सकती हूं,
कि रोने की वजहें अभी भी बाकी हैं .

(2)
यह एक स्त्री का एकांत है
जहां किसी दबंग का दखल नहीं
न किसी की उबाऊ आवाज
न किसी की थरथराती आवाज
न किसी की सदियों से जमी खांसी
खाली है सड़क मेरी तरह
तुम सुबह ही धूप ओढ़ कर चले गए थे
गीली हवा बुहार ले गई
उसके हिस्से का प्रेम
स्त्री इस बमुश्किल मिले अपने एकांत में
जंगल में छूट गए मिनरल वाटर बोटल की तरह पड़ी है...।

(3)
प्रेम करने से डरती है एक स्त्री
उसका नाम प्रेम से डरने वाली सूची में लिखा है
वह नहीं पालना चाहती बेवजह के झमेले
कभी रोना, कभी गाना
बेमौसम के मेले
रंग उतरे दीवार से दिन
नहीं चाहिए.
प्रेम से डरो कि वह आता है, अपने साथ चक्रवाती तूफान लाता है,
नष्ट कर देता है खारेपानी का जंगल
डूबने लगते हैं द्वीप
प्रेम उसे
सुंदरवन के धीरे-धीरे डूबते जाते किसी द्वीप के झाड़ पर
अंगोछे सा टांग जाता है,
सबको डरना चाहिए प्रेम से
क्योंकि एक प्रेम ही तो है
जिसके पास हंसने की वजह है
तो रोने की वजहो की भी कमी नहीं।

हेमंत शर्मा की कविताएं




हेमंत बिना मौसम के भी मौसमिया जाते हैं..जैसे बारिश में धूप के गीत और वसंत में पतझड़ का गान उनसे सुना जा सकता है। जो आपको मौसमों के अहसास से परे ले जाकर एक नए मौसम का अहसास कराता है..ठीक उसकी तरह जैसे किसी किताब या कौपी के पुराने पन्ने पर कोई मोरपंख..छटपटाता सा दिखे और आप गहरे डूब डूब जाएं..। रिश्तो की गरमाई देखते हुए कहने का दिल करता है..दुनिया को इसी रिश्ते की तरह सुंदर और गरम होना चाहिए। यहां अपने भी हैं पराये भी। प्रेम भी है और समाज की चिंता भी..। वक्त के साथ पुनर्नवा होता प्रेम सामाजिक सरोकारो से और गहरे जुड़ता चला जाता है। हेमंत चौंकाने वाले कवि हैं...वे आपको अतीत में ले जाएंगे, फिर तत्काल वहां से वर्तमान में...दोनो की दूरियो को वे इतनी कुशलता से पाटते हैं जैसे कोई खयालो में संबंधों की दूरियां पाट दे। आप खुद पढिए..देखिए..उन्हें समझाइए..वे कविता को कविता जितना हक तो दें..
गीताश्री

कविताएं


कुछ पन्ने हैं डायरी के...!

किसी महीने-साल का नाम लिख दो:
मोगरे के फूल के पास
छोटी पत्ती पर ओस के साए में
जहाँ सुबह-सुबह बैठी थी
तुम अलसाये से...
या कि शाम ढले घर लौटती 'बड़ी बी' की पेशानी पर आई बूँद
के बगल में बनाई थी जो जगह तुमने...
या फिर बादलों में आधे खुले चाँद की
धुंधली चादर में...
जहाँ बेबाक़ सी लेटी तुम खुद को अपने ही ख्वाब में
देखती...
यार एक बात बताओ, किस पते पर आये कासिद- मेरा ख़त लेकर...?

सितम्बर १६, २०१०:

वह इकलौता सफ़ेद शर्ट धुंधला गया है
अब जिस पर अनजाने में लगी थी कभी
तुम्हारी लिपस्टिक की मुहर...
उन किताबों में भी दीमकों ने बना लिए हैं
घर जो लेकर आती थी तुम हर दूसरी मुलाकात पर...
तुम्हारी आँखों का काज़ल भी छोड़ गया है अब अपना रंग
और बदल गया है उस चश्मे में,
जिसके कोने से देखती हो तुम मुझे अखबार पढ़ते हुए
अब भी कभी-कभी...
हमारे प्यार की पहली
नेमत को अभी हुए हैं पूरे पंद्रह साल कुछ घंटे पहले...
लेकिन तुम्हें
शायद मालूम नहीं,
मैंने छुपाकर रखे हैं
तुम्हारे साथ बिताये कुछ पल अपनी
शादी के नीले कोट की जेब में...
अभी-अभी कुछ कनखियाँ तुमसे चुराकर डाली हैं
ट्रैफिक सिग्नल पर बैठी उस बूढ़ी औरत के डिब्बे में,
जिसे हर रोज कुछ
न कुछ दिए जाती हो तुम चुपचाप.
विमल कुमार

मैं किसकी औरत हूं
कौन है मेरा परमेश्वर
किसके पांव दबाती हूं
किसका दिया खाती हूं,
किसका मार सहती हूं
एसे ही थे सवाल उसके
- सविता सिंह
एक जमाने में निराला ने आज से करीब 90 साल पहले ‘वह तोड़ती पत्थर’ कविता लिखकर स्त्रियों की दुर्दशा की इबारत लिखी थी। उन्होंने तब समाज व्यवस्था पर चोट की थी पर आज समकालीन हिंदी कविता में कवयित्रियां खुद यह सवाल खड़े कर पुरुष व्यवस्था पर चोट कर रही हैं कि वह किसकी औरत है? यह एक बड़ा प्रश्न है अपने समय का जो अभी तक अनुत्तरित है।
दरअसल, हिंदी कविता में महिला सशक्तिकरण का दौर आ गया है। आउटलुक मासिक ने अपने सर्वेक्षण में भले ही दस कवयित्रियों को शामिल किया है पर आज कम से कम 20 ऐसी कवयित्रियां हैं जो सक्रिय हैं और उनके संग्रह छप चुके हैं। आश्चर्यजनक और दुखद बात यह है कि आउटलुक मासिक के सर्वेक्षण में किसी पाठक ने हिंदी की वरिष्ठतम कवयित्री स्नेहमयी चौधरी का जिक्र तक नहीं है जो इन सभी कवयित्रियों से पहले से कविता लिखती रही हैं और अपना मुकाम बना चुकी हैं।
यह अलग बात है कि वह अब वर्षों से सक्रिय नहीं हैं। एक और कवयित्री शुभा का नाम भी इस सूची में नहीं है। इस सूची में सुनीता जैन को छोडक़र शेष सभी कवयित्रियां नवें दशक में स्थापित हुई हैं। हिंदी में जब से स्त्री विमर्श का दौर चला है, ढेरों संख्या में लेखिकाएं सामने आई हैं। कहानी और कविता में इस समय 30-35 लेखिकाएं सक्रिय हैं। इतनी बड़ी संख्या में लेखिकाएं सामने नहीं आई थी एक साथ।
जब राजनीति और समाज के विभिन्न क्षेत्रों में महिला सशक्तिकरण का दौर शुरू हुआ तो साहित्य की दुनिया में भी यह घटना ही थी।गौर कीजिए, छायावाद का दौर जिसमें निराला, पंत और प्रसाद के साथ महादेवी थीं। लोग अक्सर यह प्रश्न उठाते हैं कि महादेवी के बाद हिंदी में उस पाए की बड़ी कवयित्री क्यों नहीं हुई। ‘तार सप्तक’ में एक भी कवयित्री नहीं थी जबकि सुमित्रा कुमारी सिन्हा उन दिनों कविताएं लिख रही थीं।
दूसरे सप्तक में शकुंत माथुर थीं जो गिरिजा कुमार माथुर की पत्नी थीं, लेकिन बाद में उन्होंने अपने लेखन पर ध्यान नहीं दिया। तीसरे सप्तक में कीर्ति चौधरी एकमात्र कवयित्री थीं तो चौथे सप्तक में सुमन राजे एकमात्र कवयित्री थीं। इस तरह 28 पुरुष कवियों में मात्र तीन कवयित्रियां रहीं। क्या उस जमाने में केवल इतनी ही कवयित्रियां थीं या पुरुष लेखकों द्वारा संपादित ग्रंथों में, चयन में उन्हें वह स्थान नहीं मिला जिसकी वह हकदार थीं।
पिछले तीन दशकों में भारत भूषण अग्रवाल पुरस्कार की सूची में तीस कवियों में मात्र तीन कवयित्रियों को ही यह पुरस्कार मिला, क्या शेष कवयित्रियां इसकी हकदार नहीं थीं? क्या इस चयन के पीछे पुरुष निर्णायकों की वर्चस्वादी सोच काम करती रही जो महिलाओं को उसके हक से वंचित रखता है। कम से कम चार और कवयित्रियों को यह पुरस्कार मिल सकता था और मिलना भी चाहिए था-निर्मला गर्ग, कात्यायनी, सविता सिंह और अनीता वर्मा। प्रश्न यह है कि क्या हमारे समाज में लैंगिक भेदभाव काम करता है जो महिलाओं को उसका प्रतिनिधित्व नहीं देता है। हिंदी साहित्य भी इसका प्रमाण रहा है।लेकिन यह भी विचारणीय प्रश्न है कि नक्सलवादी कविता और अकविता के दौर में कोई प्रमुख कवयित्री हमारे सामने नहीं आई। अकविता के दौर में मोना गुलाटी जैसी कवयित्री का नाम जरूर सामने आया था पर उनमें वह तेजिस्वता नहीं थी। स्व. वेणुगोपाल की पत्नी वीरा भी कविताएं लिखती रहीं, पर रेखांकित नहीं हो सकीं। सत्तर के दशक में इंदु जैन, सुनीता जैन और अमृता भारती की रचनाएं सामने आईं। उसके बाद गगन गिल का नाम एक प्रमुख कवयित्री के रूप में उभरा, पर उनसे पहले तेजी ग्रोवर का पहला काव्य संग्रह निकल चुका था। सन 84 में सविता सिंह ने अपना ध्यान ‘दीर्घा’ कविता विशेषांक से खींचा पर बाद में वह कुछ वर्षों के लिए मौन हो गईं। इस बीच उसी दौर में अनामिका ने भी पहचान बनानी शुरू की। फिर कात्यायनी की कविताओं ने अपने तीखे तेवर के कारण राष्ट्रीय स्तर पर लोगों का ध्यान आकर्षित किया। उसके बाद हिंदी कविता में कवयित्रियों का पदार्पण तेजी से होने लगा। हालांकि अनुभूति चतुर्वेदी भी उसी दौर से लिख रही हैं। जब गगन गिल ने लिखना शुरू किया लेकिन उनमें वह चमक नहीं थी।हिंदी कविता में कवयित्रियों के कारण परिदृश्य आज जितना समृद्ध है, उतना कभी नहीं था।
जाहिर है हमारे समाज में भी इस बीच बदलाव आया है। बाजार ने भी स्त्रियों में एक तरह का आत्मविश्वास पैदा किया है और शिक्षा में भी। महिला साक्षरता दर भी इस दौर में बढ़ी है। आज स्त्रियां अपना सुख-दुख, आक्रोश, क्रोध, असहमति व्यक्त कर रही हैं। वह महादेवी की ‘दुख भरी बदली’ की करुणाजनक तस्वीर नहीं है और न ही वह जयशंकर प्रसाद की ‘हाय! अबला तेरा जीवन यही कहानी एक आंचल में दूध एक आंंचल में पानी’ में यकीन नहीं रखती हैं। वह अब पुरुष से कदम मिला रही है। वह पारंपरिक रूप में ‘प्रेयसी’ नहीं है, बल्कि वह मित्र और सहधर्मी अधिक है। इन सभी कवयित्रियों ने स्त्री के इस नए रूप को चित्रित किया है।
गगन गिल का संग्रह ‘एक दिन लौटेगी’ जब आया था तो उसमें इसी स्त्री के लौटने का रूपक था। वह लडक़ी लौटकर अपनी नई कहानी कह रही थी और मुक्त हो रही थी। इसलिए ‘छायावाद’ और ‘उत्तर छायावाद’ में जिस तरह स्त्रियों का चित्रण हुआ था, उससे इन कवयित्रियों ने अलग रहकर स्त्री के दुख दर्द को प्रस्तुत किया था। स्त्रियों पर अज्ञेय, त्रिलोचन, नागार्जुन शमशेर, रघुवीर सहाय, केदारनाथ सिंह ने भी की कविताएं लिखीं और उनकी गहरी सहानुभूति तथा करुणा उनके प्रति रही। पर आज की कवयित्रियां स्त्रियों के लिए पुरुषों से कोई रियायत और दया की भीख नहीं मांग रही हैं। कात्यायनी की ‘हॉकी खेलती लड़कियां’ इसका प्रमाण है।अनामिका के स्त्री विमर्श में वह विद्रोही नारी नहीं है जो गृहस्थ जीवन को तोडक़र अपनी मुक्ति खोज रही हैं, बल्कि वह घर-परिवार तथा समाज को साथ लेकर चल रही हैं। इन कवयित्रियों में हिंदी कहानी की तरह देह विमर्श नहीं है। यह सही है कि स्त्रियों के लिए अपनी मुक्ति खोजना और घर परिवार को साथ लेकर चलना मुश्किल है। मीरा और महादेवी का जीवन यूं ही एकाकी जीवन नहीं था। लेकिन ये स्त्रियां नारी मुक्ति के नाम पर राजेंद्र यादव के सिद्धांत पर नहीं चलतीं जो स्त्री विमर्श को ‘देह विमर्श’ के रूप में बदलने पर उतारू है। ये कवयित्रियां पूर्ववर्ती पीढ़ी की कवयित्रियों से बौद्धिक रूप से अधिक सक्षम, सामाजिक रूप से सचेत और परिपक्व हैं। यह सही है कि अनुभव का जो वृहद दायरा पुरुष कवियों के प्रति है वह इनके पास नहीं है क्योंकि सामाजिक दृष्टिï से उन्हें वह स्वतंत्रता नहीं मिलती जो एक पुरुष कवि को अनुभव की विविधता के रूप में मिलती है। इसके लिए सामाजिक ढांचा जिम्मेदार है।
शायद यही कारण है कि कोई महिला कवि नागार्जुन, त्रिलोचन नहीं हो सकती। वह रघुवीर सहाय भी नहीं हो पातीं क्योंकि उन्हें नौकरी के साथ-साथ अपना घर भी देखना है। लेकिन पुरुष वर्चस्वादी मानसिकता के शिकार लेखक यह प्रश्न जरूर करते हैं कि हिंदी कविता में जितने बड़े पुरुष कवि हैं उतनी बड़ी कवयित्री क्यों नहीं, मीरा और महादेवी को छोडक़र। इन कवयित्रियों के सामने भी यह प्रश्न है कि वह अज्ञेय या नागार्जुन बन पाएंगी और अपने अन्य समकालीन कवियों को टक्कर दे पाएंगी।
कथा साहित्य में स्थिति थोड़ी बेहतर है। हमारे पास उषा प्रियंवदा, कृष्णा सोबती, मन्नू भंडारी, मृदुला गर्ग, मृणाल पांडेय, मैत्रेयी पुष्पा तो हैं पर कवयित्रियों की शख्सियत अभी उतनी बड़ी नहीं बन पाई है।

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